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]]>आओ चलो, दीप रखते हैं
छत-मुंडेर पर,
आले-खिड़की, देहरी पर,
सूने आंगन के कोने कोने
जहां हमारा गेह, हमारा नेह।
आओ चलो, दीप रखते हैं
राह सलोनी, नुक्कड़ नाले पर,
रसवंती नदी, फुदकती धार, सेतु पर
जहां निखरता,
सहज सिरजता जीवन धारे देह।
आओ चलो, दीप रखते हैं
खेतों-मेड़ों पर,
पोखर, बाड़ी, ताल-तलइया, पनघट पर
बंसवट की ओर,
बाग में छांव तले
जिनसे अनूप यह धरा धाम, यह देश।
आओ चलो, दीप रखते हैं
गीतों पर,
अपनी सुधियों पर,
प्रिय-प्रतीति की अनगिन श्वांसों, निःश्वासों पर
हृदय वीथिका, अंतर्मन के सहज कपाटों पर
जहां राग, विश्वास, सहज स्वीकार सजे चहुंओर।
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]]>The post Arattai – संदेश और संवाद माध्यमों का स्वदेशी संस्करण appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>Arattai (अरट्टै, अरट्टई) भारतीय कंपनी Zoho द्वारा विकसित एक मैसेजिंग ऐप है। Arattai शब्द तमिल में ‘आम बातचीत’ और ‘चैट’ के अर्थ में प्रयोग होता है। यह ऐप Zoho द्वारा पूरी तरह भारत में ही विकसित किया गया है। Arattai अरट्टै की आत्मा उसकी देशज आत्मनिर्भरता, सहजता और भारतीयता है। यहाँ संवाद पर बाहरी दबाव या विदेशी तकनीकी विसंगतियां नहीं हैं। इसमें संवाद की स्वतंत्रता, गोपनीयता एवं स्थानीयता का ताजा स्पर्श है।

डिजिटल दिग्गजों के डिजिटल विकल्पों (WhatsApp, Telegram, Signal इत्यादि) के अभ्यस्त हम भारतीयों के लिए यद्यपि इसे अपनाना इतना सहज नहीं, पर Arattai की विशिष्टियाँ शायद हमें अपनी ओर खींच रही है।
उपयोगकर्ताओं द्वारा उपयोग की निरन्तरता और अरट्टै द्वारा बिना बाधा प्रदान की गई उन्नत एवं सक्षम सुविधाओं का मेल यदि संभव हुआ तो संदेशों के आदान प्रदान के लिए इससे सुंदर कोई भारतीय विकल्प नहीं।
भारतीयता का आग्रह, जोहो Zoho कंपनी की विशेषज्ञता, विश्वसनीयता एवं विदेशी ऐप के समर्थ विकल्प होने के कारण Arattai भारतीयों की आँखों का तारा बन गया है।
अरट्टै मुख्य रूप से WhatsApp, Telegram, Signal जैसे मैसेजिंग ऐप तथा Google Meet/ Zoom जैसे वीडियो मीटिंग ऐप्स का सशक्त विकल्प है। इसमें एक ही जगह संवाद, ग्रुप, कॉलिंग और मीटिंग—ये सब सुविधाएँ उपलब्ध हैं। यह उन विदेशी ऐप्स की कमियों को दूर करता है, जो अक्सर उपयोगकर्ता की सूचनाओं को अपने देश से बाहर स्टोर करते हैं या अनचाहे AI व विज्ञापन थोपते हैं।

भारतीयता संवाद के लिए भारत में विकसित ऐप होने के साथ ही Arattai व्यक्तिगत एवं प्रोफेशनल दोनों उपयोग के लिए अनुकूल है। भारतीय भाषाओं का समर्थन तो है ही भारत के डिजिटल स्वराज एवं तकनीकी स्वावलंबन की दिशा में एक प्रमुख पहल भी है यह।
ग्रामीण भारत के लिए इसकी लो डेटा कंजम्प्शन व आसान फोन संगतता गेम चेंजर है। ग्रामीण भारत में ऐसी तकनीक बहुत बड़ी सहूलियत है जहां डेटा और उपकरण सीमित हैं।
इसमें ग्रुप, चैनल, स्टोरी, शेड्यूल मीटिंग, फोटो-वीडियो-डॉक्युमेंट शेयरिंग, लोकेशन, ऑडियो/वीडियो कॉलिंग जैसी सभी आधुनिक सुविधाएं मिलती हैं।
सरकारी विभाग, विद्यालय प्रशासन, सामुदायिक समूह—जिन्हें उपभोक्ता डेटा की निजता व संप्रभुता चाहिए, उनके लिए भी यह विश्वसनीय मंच है।
हम लोग संदेशों के आदान प्रदान के लिए WhatsApp और Telegram जैसे ऐप अपनाए बैठे हैं, पर विदेशी उत्पाद होने के कारण हम इनके उपयोग से बचना भी चाहते हैं। हम WhatsApp से दूरी बनाना इसलिए भी चाह रहे हैं क्योंकि –

तो इसलिए अब हमारे पास एक उन्नत, तेज, समृद्ध और समर्थ भारतीय विकल्प Arattai है। यह सभी प्लेटफ़ॉर्म के लिए उपलब्ध है। इसे आप एंड्रॉयड, विंडोज़, मैक, IOS सभी के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। अतः इंस्टॉल करिए और संदेश भेजने के देशी रंग को अपनाइए।
अब हमारे लिए यह कहना सहज एवं सुखद है – मेरा देश, मेरी भाषा, मेरा संवाद और मेरा ऐप।
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]]>The post आशीष त्रिपाठी का काव्य संग्रह शान्ति पर्व appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>संग्रह की ‘सच मानो’ समूह की एक काव्यात्मक स्फूर्ति ‘एक सुबह अस्पताल’ है। सितम्बर मास, सरकारी अस्पताल का जनरल भर्ती वार्ड। अस्त-व्यस्त रोग शैया पर निढाल पड़ी वार्धक्य दिशि का आमंत्रण पढ़ती रुग्णा शिशु वत्सला माँ। घेर-घेर कर खड़े स्वजन-परिजन। पश्चाताप का पुरश्चरण करती फटी-फटी आँखों वाली रुग्ण की उश्वासें और इसी बीच धक्कामुक्की कर घुसी कौमार पीठिका पर आसीन डबडबायी आँखों वाली विह्वला एक बालिका। इतस्ततः चक्रमण करती घायल मृगशावकी के नयन गंगा यमुना हो गए हैं। वह भी ऐसी कि मार खाकर भी न बोली। पत्नी का आश्चर्य और पति का शून्यावलोकन- यह युगपत समीकरण भाजक-भाज्य बनकर कलेजा कचोट रहा है। काँख की गुदगुदी मुख का वमन बन गई है।

सच मानो ऐसी ही होती है किसी सरकारी अस्पताल की सामान्य व्याप्ति। सच मानो ऐसा ही होता है एक सुबह अस्पताल का कोई सितम्बर। सच मानो ऐसी ही होती है असहाय स्वजनों की भटकती आहें। सच मानो ऐसी ही होती है रुग्णा के रागरंजिता समिधा की आहुति। सच मानो ऐसी ही होती है किसी की आँखों से झरे अश्रुबिन्दु जैसी बालिका की अनबोली डबडबायी आँखें, और सच मानो ऐसा ही होता है मलिन बिस्तर के सिरहाने-पायदाने परिक्रमा करता कवि का संचारी भाव। ‘एक सुबह अस्पताल’ यथार्थ से भी यथार्थ की हड्डी चुन लेने वाली कविता है।
एक बड़ी ही मार्मिक कविता है, ‘दूध पीते बच्चे को देखकर’। यों तो इस संग्रह की ‘जीना’ ‘पुरवा’, ‘कलयुग’, ‘काला सूर्य’, कालिदास’, ‘क्षमा में जुड़े हैं मेरे हाथ’, ‘गहनों की दुकान पर’, ‘तुम्हारी याद’ और ‘तुम्हारा जाना’ जैसी अनेकों निराली रचनाएँ हैं जिनकी तासीर बहुत गर्म है और वे अलग से विवेच्य हैं, किन्तु सच मानो तो ‘दूध पीते बच्चे को देखकर’ इस संग्रह की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है-
‘स्तनों को अपने कोमल होठों के बीच दबाये
दूध की धार खींचता
वह मूँद लेता है अपनी आँखें
जैसे महासुख तृप्ति में नहीं
तृप्ति की प्रक्रिया में है।”
इन पंक्तियों में एक अनुत्तरा झंकृति है। स्तन खींच रहा है, खींच रहा है, खींच रहा है, ततः किम्! महासुख तृप्ति में नहीं तृप्ति की प्रक्रिया में है, ऐसा क्यों? इसलिए न कि गतिमत्यता ही जीवन है! दूध पीते बछडे की पीठ चाटती पयोधरा धेनु जिसका रोम-रोम दुग्धमय हो गया है, जिसकी आँखें बन्द हैं! शिशु जो स्तनपात निरत है, उसकी आँखें बन्द हैं। कुतिया की सूखी अठली को चिचोरते पिल्लों की आँखें बन्द हैं, क्यों? बन्द आँखों को गति का ख़याल कहाँ! गति तो पुनरावर्तन है, अगति तृप्ति है। छाती खींचता बालक मुँह पर दूध की धार झेलकर हँसता है, यह तृप्ति का ही आस्वाद है। ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते’। धाय माँ की मजबूरी भी भजनफल में तृप्ति ही है। स्रवित पय पयोधरों से अधर का स्पर्श ही तृप्ति है। अन्यथा विविक्त संगी मुनियों ने इसी लिए यों ही नहीं कहा था- मातुः पयोधर रसं न पुनः पिवन्ति।’ इस पयःपान कि अनबूझ पहेली सुलझाने में कवि की भावयित्री प्रतिभा अभी और अनेकों पृष्ठ रंगेगी।
मैं इस कविता के सम्मोहन में हूँ। भाव के स्तर पर वात्सल्य के स्पर्श से निथरती करुणा इस कविता मे स्मृति का स्पर्श पाकर विचारों की धुकधुकी में समा जाती है। कवि परम्परा और समय से दो चार होता है, विडम्बनाओं का स्वीकार विचित्र है उसके लिए-
“मनुष्य की महान जय यात्रा की कहानी
दरअसल शुरु होती है यहीं से
दो, तीन या चार थनों के दुह लिए जाने का स्वीकार ही है
सभ्यता की पहली मंजिल”
और अबूझ है धरती का अनन्तकाल से इसे चुपचाप सहना –
“इस दूध पीते बच्चे को देखते
मेरी आँखों में तैरती है धरती
एक गाय की तरह विवश
सहती अनन्तकाल से
दो, तीन या चार थनों का दुह लिया जाना
चुपचाप”
संग्रह की एक विलक्षण लम्बी कविता है ‘काला सूर्य’। यह ‘काला सूर्य’ कविता विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र का अखंड पाठ कर रही है।
‘आकाश है नीला/ पर दीखता है अभीं काला’
इसी सूर्य के ही कारण। आकाश क्षय रोगी है, बल वीर्य विहीन। काला सूर्य ‘ मृगपति सरिस अशंक’ उसी आकाश वीथि में ताण्डव मचाए है। दमकता है, चमकता है, आँखों में अन्धेपन की अविश्रान्त रतौंधी रच देता है। नव सर्जित सौर्य मण्डल में आकाश गंगा की परिक्रमा बीच अनिवार्य उछलकूद मचाता है। ग्रहण ग्रस्त न होने की कठिन व्यूह रचना कर ली है। गेरुआ, सफेद, पीला- सब रंग उसकी काली कामरी में लिपट कर काला-काला-काला की थपोड़ी बजा रहे हैं।
उजला सूर्य, उजली ऋचायें, उजले ऋषि, उजले मंत्र सब अतिसार के रोगी हो गए हैं और वमन विरेचन की ऐंठनदार प्रक्रिया में उलझकर हाथ पाँव पटक रहे हैं। फटी-फटी आँखें पूछती हैं – ‘उगा ही क्यों ऐसा सूर्य!
“पराया बनाने वाली ध्वनियाँ
दबंगों सी घूम रही हैं
चीखते चिल्लाते धमकाते”
कितना बलात्कार करेंगी ये! ऐसे शील-हरण का शठ सौन्दर्य अब बर्दास्त के बाहर है।
कवि कहता है-
“तेजस्वी काले सूर्य की अभ्यर्थना में
खड़े हैं हम
……………
भागता हूँ
भागता ही जाता हूँ बेबस
कहीं मिले कोई दृश्य
कोई छुअन
कोई बोल”
इतना लाचार, इतना बेचारा, इतना बेबस! आँखें भरती हैं जब कवि अपनी आहों के शब्द विन्यास की अन्तिम कड़ी में पीठिका सँवारता है –
“आत्मा का उजास
किसी पर्वत की खोह में एक शैतानी संदूक में बंद है”
तनिक दृष्टि बदलें। पूरी की पूरी कविता ही द्वंद्व समास है। कृष्ण ने कहा था न कि समासों में मैं द्वंद्व हूँ। ‘चार्थे द्वंद्वः”। यह भी और वह भी। यह काले सूर्य का क्षैतिज पसारा जो दृश्य है, pessimism की ठठेरी सँजोये लुढ़क जायेगा अतलान्त महासागर में। आत्मा के कालकूट को मर्दित कर संजीवन अमृत का कलश लिए धन्वंतरि आने ही वाला है। आत्मा तो उसे ही आत्मसात करेगी। छटपटाता बिलखाता भाग खड़ा होगा काला सूर्य। ‘तमस्तदासीत गहनं गभीरं की यवनिका छिन्न भिन्न होगी, होगी और ‘यस्तस्य पारेभि विराजते विभुः’ का विरोचन निकलने ही वाला है, निकलने ही वाला है। कवि की कसकती आत्मा वाह्य शब्दों का धोबियापाट भले ही लगा रही हो, पर मल्लयुद्ध में कुन्तीसुर की विजय सुनिश्चित है। हार जाएगा गांधारी का बेटा।
कविता अपनी मार्मिकता में इतना कुरेद रही है कि नींद उड़ जाती है।
आशीष त्रिपाठी की कविताई की मनोगति न तो मंदाक्रान्ता है न द्रुत विलंबित। न तो वसंत तिलका है न शिखरिणी। इन्द्रवज्रा भी नहीं। हाँ, शार्दूल विक्रीड़ित है। विहंगावलोकन नहीं, सिंहावलोकन। सूक्ष्मता से प्रत्येक भाव, भावना और विचारों का अवलोकन और अभिव्यक्ति में अनूठे संयम से प्रभावपूर्ण प्रकटन, यह दुर्लभ युति सहज सुलभ है आशीष त्रिपाठी की कविताओं में।
शान्ति पर्व ठिठक ठिठक कर पढ़ने की कविता की क़िताब है, क्योंकि हर ठिठकन पाठक को भाव, विचार, भाषा और अभिव्यक्ति का अनोखा वैभव साक्षात करने का अवसर देती है। बस इतना ही।
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]]>The post गुरु गोरखनाथ की बानी – मेरा गुरु तीन छंद गावै appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>गुरु के बिना गोरखनाथ स्वयं को अकेला अनुभव कर रहे हैं। गुरु का प्रत्येक अनुभव उन्हें स्मरण हो रहा है, वह बेचैन हैं। गुरु की उपस्थिति ही उन्हें सहज और संतुष्ट कर सकती है। वह गुरु के कहे गये वचन याद कर रहे हैं और उनकी गूढ़ता एवं अर्थ-गंभीरता से मुग्ध हैं। गुरु के वचन कितने अर्थयुक्त एवं रहस्यमय हैं कि गोरखनाथ अपनी नींद ही गँवा बैठे हैं-
मेरा गुरु तीन छंद गावै
गोरखनाथ
ना जाणौ गुरु कहाँ गैला, मुझ नींदणी न आवै।
इसका मतलब है, ‘मेरा गुरु तीन छंद गाता है। अर्थात् एक ही बात को तीन तरह से कहता है। मुझे पता नहीं, मेरा गुरु कहाँ चला गया? उसके बिना मुझे नींद नहीं आ रही है।’ गुरु की अनुपस्थिति में गुरु की बताई अनेक बातें उन्हें याद आ रही हैं।
गोरखनाथ अपने गुरु द्वारा दी गई शिक्षाओं के प्रति विनम्र हैं, उन्हें सब समझाए हुए आप्त वचन स्मरण में आ रहे हैं। माया का निराला खेल उन्हें समझ में आ रहा है। माया कैसे प्रकट सत्य को भी भाँति-भाँति के उपकरणों में उलझाकर मनुष्य से गोपन रखती है, गोरखनाथ यह जान गये हैं। सतगुरु ही है जो इस माया का खेल समझा सकता है, उसके गोपन रहस्यों का उद्घाटन कर सकता है। माया का खेल तो देखो।
कुम्हरा के घर हांडी आछे अहीरा के घरि सांडी।
बह्मना के घरि रान्डी आछे रान्डी सांडी हांडी।
राजा के घर सेल आछे जंगल मंधे बेल।
तेली के घर तेल आछे तेल बेल सेल।
अहीरा के घर महकी आछे देवल मध्ये ल्यंग।
हाटी मध्ये हींग आछे हींग ल्यंग स्यंग।
एक सुन्ने नाना वणयां बहु भांति दिखलावे।
भणत गोरष त्रिगुंण माया सतगुर होइ लषावे।

उपरोक्त रचना में गोरखनाथ माया की लीला समझाते हैं। माया किस प्रकार भिन्न भिन्न दिखाई देने वाली हर सत्ता में व्यक्त हो रही है, उसके लिए वह रोचक एकरूपता ढूँढते है। वह कहते हैं कि माया कुम्हार के घर में ‘हांडी’, अहीर के घर में ‘सांडी’ अर्थात् मलाई और ब्राह्मण के घर उसकी स्त्री (राँडी या रानी) के रूप में है। इस प्रकार रांडी, सांडी और हांडी एक ही चीज है। ठीक वैसे ही वह राजा के घर में ‘सेल’ अर्थात् (शासन की छड़ी), जंगल में ‘बेल’ (लता) और तेली के घर में ‘तेल’ के रूप में है, और अलग अलग होते ही भी एक ही चीज है।
इसी तरह अहीर के घर में ‘दही/मट्ठे’ के रूप में, देवस्थान अथवा मंदिर में ‘लिंग’ तथा बाज़ार में ‘हींग’ के रूप में व्याप्त है। यह माया एक ही है, परंतु भिन्न भिन्न स्थानों में, भिन्न भिन्न रूपों में विभिन्न कार्य-व्यापार में व्यक्त हो रही है। गोरखनाथ के अनुसार एक ही सत्य विभिन्न रूपों में प्रकट होता है और त्रिगुण (सत्त्व, रजस, और तमस) से युक्त माया को केवल सतगुरु के मार्गदर्शन से ही पार किया जा सकता है।
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]]>The post अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या निरंकुशता appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>बहुत पहले मनुष्य की अभिव्यक्ति पर पहरे थे। विश्वभर में इस पहरेदारी के विरुद्ध हमने क्रांतियाँ कीं।पश्चिम से शुरू हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत पूर्व में भी छा गई। हर एक संविधान तक में, हमारे संविधान में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार व्याप्त कर दिए गए। हर जगह कहा जाने लगा वह सब कुछ, जो मन में आया। इस अभिव्यक्ति के ने शब्दों को नवीन गति, नई तीव्रता दी।
पर हमने ख़याल नहीं किया कि बोलने का स्वातन्त्र्य धीरे धीरे निरंकुशता की ओर गया। पश्चिम में तो बहुत पहले, कुछ वर्षों से हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्या क्या नहीं हुआ है। बोलने की आज़ादी ने मर्यादाओं का शील भंग कर दिया है, समाज का संस्कार ठुकरा दिया है। यह स्वातंत्र्य न जाने कितनी मुक्तियों और न जाने कितने आंदोलनों के नाम हो गया। याद क्या करें, क्या-क्या करें। नारी देह की छद्म अभिव्यक्ति, देवी देवताओं के नग्न चित्र, वर्जनाओं को मुखर अभिव्यक्ति देते चलचित्र और फ़िल्में, अनियंत्रित भावना से उपजी महापुरुषों के लिए असंयत वाणी- सब हमारे सम्मुख है।
पश्चिम की अंतश्चेतना मन को नहीं जानती, प्राण को भी नहीं जानती। इसलिए वहाँ अभिव्यक्ति निरंकुश हो जाय, तो आश्चर्य क्या! पश्चिम हर क्रिया की प्रतिक्रिया देता है, हर दोषारोपण की काट करता है, हर झूठ का स्पष्टीकरण देता है। उसे लगता है झूठ साफ़ हो जाएगा। पश्चिम को लगता है झूठ के पैर नहीं होते। सच है, पर झूठ के पास वीर्य होता है। इस वीर्य से प्राण गर्भित हो जाता है और झूठ प्राणवंत।
अभिव्यक्ति, वाणी जब निरंकुश हो जाती है तो वह सारे संयम तोड़कर जनसाधारण के प्राणों से बलात्कार करती है –
प्राण एक निर्वस्त्र, असहाय कुमारी कन्या की तरह है। वाणी पुरुषों का हुजूम है, जिन्हें प्रजातंत्र में इजाज़त है। जो चाहे बर्ताव प्राणों से करें। वे प्राण कुमारी से बलात्कार करते हैं और प्राण रोज़ उसके शब्दों से गर्भित होते हैं, और उसी के बच्चे पैदा करते हैं, जिनमे तानाकशी और झूठ तो वाणी का होता है और सारा बदन प्राणों का।
निर्मल कुमार- ‘ऋत: साइकोलॉजी बियांड फ़्रायड’
इसलिए केवल अभिव्यक्ति, केवल बोलना सत्य नहीं रच सकता। अकेला तो प्राण भी सत्य नहीं रच सकता। जो सत्य है वह इसी प्राण और अभिव्यक्ति के संसर्ग से जन्म लेता है।
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]]>The post ब्रश करती तुम्हारी अंगुलियाँ (कविता) appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>कितना अनोखा है वह स्पर्श
जिसमें दो मिल जाएं तो दूर हो
गंध भी, मैल भी।
ब्रश ने कितना ढाल लिया है खुद को
तुम्हारे ढंग में
और रंग गया है
तुम्हारी अंगुलियों के रंग में
कि गर वो कहें कि रुको
तो रुक जाए,
कहें चलो तो चल पड़े,
और कहें इतराओ
तो अपनी मौज में हर ऊंची – नीची गली हो आए।
अंगुलियां तो वक्त की मानिंद
जिद अपनी उठाए
ब्रश अपना खिलौने-सा
सभी कुछ मान जाए
मैल तो बस रोज की उन आदतों की ही तरह है
हम तनिक भी सो रहे,
आकर वहीं डेरा जमाए
और मुंह की गंध
वैसी ही कि जैसी वासना अपनी
जहां भी मैल आए, गंध आए
ठीक वैसे ही
कि जैसे सोच अपनी
बुरी होकर आदतें बेकार लाए।
सुनो! मुझ पर यह करो उपकार
आंखे बन्द कर लो
चूमने दो सुबह ही
इन प्रेम के सहकार होठों को
जिन्होंने बांध रखा है सहज ही वासना को-
मैल को भी, गंध को भी।
कितना सुंदर है ब्रश करती तुम्हारी अंगुलियों का कांपना।
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]]>The post प्रेम प्रलाप appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>मुझे मेरी अतिशय भावनाओं ने मारा, मेरे सारे बेहतर काम दब गये मेरी भावनाओं के प्रकटीकरण में। तुम्हें नियंत्रित लोग, भावनायें, इच्छायें और संयमित व्यक्तित्व चाहिए, जो मैं बन कर दिखा न सका!
मैं विराट प्रेम की थाह में था, सब खो कर भी आपको पाने की अदम्य भावना से भरा, कुछ भी इधर-उधर न हो, इस तीव्र इच्छा से संपृक्त। पर भाग्य अबूझ है मेरे लिये। चन्द्रमा लिखने जाता हूँ, राहु लिख कर लौटता हूँ।
आपकी ऊँचाई के आस-पास भी न पहुँचा। आपके हृदय को दुखाया, अनेकों बार। आपने बहुत बार नजरअंदाज किया, पर हर बार कैसे क्षमा करेगा कोई! तुम्हारा दिया दंड मेरे लिये अनंत में जाने की राह बनेगा।
आपके आने के बाद धरती सुन्दर थी, लगने भी लगी थी, सब कार्य, निर्णय करने का एक उद्देश्य था। आपने सहज ही सारे संकट खत्म कर दिये मेरे लिये। अब कोई संघर्ष न रहा। आकाश की यात्रा की जा सकेगी अब। धरती पर रहने का उद्देश्य खो गया अब।
निश्चित ही तुम्हें प्यार करना और तुम्हारा प्यार पाना अनूठी उपलब्धियाँं थीं मेरे लिये। जानता हूँ, यह आपकी इच्छा और कृपा से ही संभव हो पाया था।
दैवीय आत्मायें स्वयं किसी की इच्छा नहीं करतीं बिलकुल तुम्हारी तरह, पर उनकी इच्छा सम्पूर्ण सृष्टि करती है। तुमने मुझे वह गौरव दिया, वह संतुष्टि दी, इसके लिये मेरा जीवन कृतकृत्य है, ऋणी है।
शायद उस वक्त मेरी दिशा सही थी, मैं योग्य रहा या न रहा। वह कृपा हमेशा साथ रहेगी मेरे। अब जबकि मेरी दिशा ही ठीक नहीं शायद, और तुमने मुझे मेरे किये का दण्ड दे दिया है, तो दूर कर लोगे मुझे फ़िर भी कैसे दूर हो पाऊँगा मैं? जो पा लिया है वह कैसे खोयेगा मेरे भीतर से?
मेरी माँग हमेशा से तुच्छ रही, तुम्हारे द्वारा वह माँगे पूरा किये जाने पर तुम्हारा गौरव घटता उसमें। मैं समझता हूँ यह। इसलिये- हर बुरी आदत छोड़ता रहा। पर बुराइयों से मुक्त न हो पाया, तुम्हारे योग्य न हो पाया।
मैंने सदैव तुम्हें कष्ट दिया, हमेशा तुम्हें परेशान किया, उससे तुम्हें छुटकारा ज़रूर मिलना चाहिए।
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]]>The post डायोजिनीज़ (Diogenes) का एक प्रेरक प्रसंग appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>मनुष्य का स्वभाव है, प्रत्येक परिस्थिति एवं कार्य के प्रति अपनी धारणा बनाना। अभाव में भी स्वभाव न छूटता है। विपन्नता में भी मन विनय की डोर नहीं पकड़ता है। प्रतिक्रिया उसका स्वभाव है।
वह व्यक्ति जो संसार की, मन की इसी पकड़ से छूटना चाहता है, निस्पृह जीवन के अनन्य अभ्यासों में स्वयं को खपा देता है। फिर वह हर परिस्थिति के लिए तैयार होता है, विनम्र होकर। हर प्रतिक्रिया का सहज स्वीकार उसका हेतु होता है।
यूनान का एक प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता डायोजिनीज़ (Diogenes), जो कि सुकरात का शिष्य था, अपना जीवन एक माँद में ही बिता लेता था। वह अपने रहने के लिए घर बनाना आवश्यक नहीं समझता था।
एक बार किसी युवक ने उसे देर तक एक पत्थर की मूर्ति से भीख माँगते देखा। उस युवक ने पूछा – “डायोजिनीज़! भला पत्थर की मूर्ति से तुम क्यों भीख माँगते हो? क्या वह तुमको भीख दे देगी?”
डायोजिनीज़ ने उत्तर दिया, “मैं इस मूर्ति से भीख माँगकर किसी पुरुष से भीख न देने पर शान्तचित्त रहने का अभ्यास कर रहा हूँ।”
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]]>The post तुम्हीं मिलो, रंग दूँ तुमको, मन जाए मेरा फागुन appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]> यूँ तो ऋतु वसन्त में खग-कुल अनगिन राग सुनाता
आम्र बौर छूकर समीर मादक विभोर धुन गाता
मैं तो प्रिय के मधु अधरों की सुनता क्षण-क्षण गुन-गुन
तुम्हीं मिलो, रंग दूँ तुमको, मन जाए मेरा फागुन।
देखो! सूरज ललक बाँह में भर लेता सरसिज को
विटप, पुष्प, सरि, खग कैसे पाती देते मनसिज को
मैं भी तुमसे मिलकर गाऊँ रहस-भरी रस-रंगी धुन
तुम्हीं मिलो, रंग दूँ तुमको, मन जाए मेरा फागुन।
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]]>The post भारती तेरी जय हो (सरस्वती वंदना) appeared first on Sachcha Sharanam | सच्चा शरणम्.
]]>अरुणोदय में सुन हंसासिनी तव पदचाप विहंग
थिरक थिरक गा रहा प्रभाती पुलकित सारा अंग
तेरे स्वागत में खिल जाती कुसुम कली साभार-
भारती तेरी जय हो!
तेरी ज्ञान किरण दिनकर सी विधु किरणोमय हास
तुम्हीं सरल सागर श्रद्धा सी हिमगिरि सी विश्वास
तेरी विशद कीर्ति के सम्मुख व्यर्थ व्योम विस्तार-
भारती तेरी जय हो!
तुम्हीं रंग विरहित क्षण क्षण में क्षण में रंग विरंग
तेरी करुणा कामधेनु-सी दया देवसरि गंग
तेरा दिव्य दुकूल दिशा दश तारावलि उर हार-
भारती तेरी जय हो!
तेरी रसवर्षिणी गिरा वर्धिनि आनंद प्रमोद
निरालम्ब आश्रय सुखदायिनि तेरी पंकिल गोद
तुम्हीं भाव वारिधर लुटाती अविरल प्रेम दुलार-
भारती तेरी जय हो!
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